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संजय दत्त के परिवार का अनोखा सच्च हिंदी में | The truth story of Sanjay Dutt's family

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संजय दत्त के परिवार का अनोखा सच्च हिंदी में | The truth story of Sanjay Dutt's family

The truth story of Sanjay Dutt's family


The truth story of Sanjay Dutt's family नमस्कार दोस्तों आपने संजय दत्त के बारे में बहुत सारी बातें सुनी होगी लेकिन फिर भी हजारों ऐसे किस्से सुनने बाकी है जो कभी आपने सुने भी नहीं होंगे संजय दत्त की माता नरगिस और पिता सुनील दत्त उनके बारे में आप सभी ने सुना होगा और बहुत सारी उनकी फिल्में भी देखी होंगी और अभी आप जानते हो कि वह दोनों भी संजय दत्त की तरह ही एक अच्छे हीरो थे।


संजय दत्त की नानी जद्दनबाई की अनोखी कहानी का किस्सा


संजय दत्त और उसकी लाइफ के इतने किस्से हैं अगर हम किताबें लिखने बैठ जाएं तो रखने के लिए शायद जगह ही ना बचे उन्हीं किस्सों में से आज एक किस्सा निकाल कर लाई हूं जिसको मैं आपके सामने शेयर कर रही हूं संजय दत्त और उसके परिवार के बारे में आप सभी जानते होंगे लेकिन आज मैं बात करने जा रही हूं संजय दत्त के नानी और बनारस के कोठे की मशहूर तवायफ जद्दनबाई के बारे में जद्दनबाई के बारे में भी मैं आपको बताऊंगी लेकिन उससे पहले मैं आपको बताती हूं दलीपा बाई के बारे में यह कहानी शुरू होती है 1897 के बाद जब भारत अंग्रेजों का गुलाम हुआ करता था।

बनारस के एक ब्राह्मण परिवार में जन्म होता है एक बिटिया का जिसका नाम रखा जाता है दलीपा पुराने समय में बहुत जल्दी लड़कियों की शादी कर दी जाती थी ठीक वैसे ही दिलीपा की शादी भी बहुत छोटी उम्र में ही कर दी गई लेकिन अपने से 4 गुना बड़े आदमी के साथ लेकिन सभी चीजें वैसे नहीं चलती जैसे हम चाहते हैं शादी के कुछ सालों बाद ही दिलीपा विधवा हो जाती है।हाला के उस समय में पुनर्विवाह कानून तो था लेकिन उस को सामाजिक मान्यता नहीं दी गई थी। लेकिन खत्रीय और ब्राह्मण वर्गों में तो बिल्कुल मानता नहीं थी। लेकिन उस वक्त विधवा को संभाल कर रखना एक परिवार के लिए बहुत बड़ी आफत जैसा था। 

लोग एक विधवा को अभिशाप की तरह देखते थे। दलीपा के अपने घर वाले भी उससे नफरत सी करते थे।  घर वाले उसको एक आफत मान कर एक बार बनारस के मेले में लेकर गए और मेले की भीड़ में दलीपा के घर वाले उसको अकेली को छोड़ कर घर वापस आ गए और वह वहां कोने में अकेले बैठ कर रोने लगीरोने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकती थी क्योंकि पहली बार वह घर की चारदीवारी के बाहर निकली थी और ना ही उसको घर का रास्ता पता था। एक व्यक्ति जो संगीतवान था उसका नाम मिया जान था। उसकी अचानक नगर मेले में बैठे इस बच्ची पर पड़ती है। वह उसे अपने घर लाता है और शादीशुदा होने के बावजूद भी उससे शादी कर लेता है।

यह भी कहा जाता है कि दलीपा से ज्यादा उम्र की मियां जान की बेटियां थी लेकिन फिर भी वे उसे शादी करता है और अपने घर में रखता है।इसके बाद दलीपाबाई की तीन संताने होते हैं एक बच्चा तो जन्म के दौरान ही मर जाता है और दो बच्चे एक लड़का और लड़की बच जाते हैं। मियां जान संगीत से जुड़ा हुआ था इसलिए उसने अपने बच्चों को भी संगीत की शिक्षा दीऔर उसके बच्चे नाच गाना करके पैसे कमाते थी और उन्हीं पैसों से परिवार का पोषण चलता था।मियां जान अपनी बेटी के गाने के हुनर को देखते हुए उसको ऊंची तालीम दिलवाना चाहता था इसलिए वह जद्दन बाई को लेकर कोलकाता चला जाता है। मलिकाजन को वह जद्दन के बारे में बताता है के वह कितनी प्रतिभाशाली है।

उस जमाने में मालिका जान की एक मशहूर सहेली हुआ करती थी जो कि भारत की मशहूर गायिका थी। जिसका नाम था गौहर जान उसने जब जद्दन बाई का गाना सुना तो उसको बहुत अच्छा महसूस हुआ और उसने अपने उस्ताद मोजू दीन के पास संगीत सीखने के लिए उसको भेज दियाजब जद्दनबाई कि संगीत की शिक्षा पूरी हुई तो बहुत अच्छी गायक बन गई और इसके बाद जद्दनबाई की मां दिलीपा उसको कोलकाता से बनारस में वापस ले आई और उसे कोठे पर बिठा दिया जाता है क्योंकि गाना बजाने वालों का जो ठिकाना  होता है वह उस समय का कोठा हुआ करता था जहां गाने बजाने के साथ-साथ पूरी अयाशियां भी होती थी।जद्दनबाई कोठे की रौनक बनती चली गई और दूर-दूर से लोग आने लगे इसके बाद दिलीपा बाई ने जद्दनबाई की शादी करवा दी उसकी शादी होती है नरोत्तमदास खत्री से उसे उसको एक बेटा होता जिसका नाम होता है  अख्तर हुसैन इसके बाद एक और बेटा होता है 2 बच्चों के बाद जद्दन का पति उसे छोड़कर कहीं दूर भाग जाता है।

इसके बाद हाल बहुत बुरा हो जाता है क्योंकि खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं और उनको भीख मांगनी पड़ जाती है। इसके बाद जब दलीपा ने बनारस छोड़ दिया और लखनऊ चली गई लखनऊ में एक खानदानी और रहीस व्यक्ति हुआ करते थे जिनके बहुत ज्यादा सिनेमाघर थे। लखनऊ मेंउनका एक बेटा था उत्तमचंद मोहन जो लखनऊ के एक मेडिकल कॉलेज में डाक्टरी की पढ़ाई करता था लेकिन पढ़ाई बीच में छोड़ कर वह चंदन के प्यार में पड़ जाता है।लेकिन उत्तमचंद के घरवालों को एक दो बच्चों की मां और ऊपर से एक तवायफ के साथ रिश्ता पसंद नहीं आया गांव से अपने घर से निकाल देते हैं

घर से निकलने के बाद उत्तमचंद जद्दन से शादी कर लेता है और इसके बाद उनकी एक बेटी होती है जिसका नाम होता है फातिमा यही फातिमा आगे चलकर हिंदी फिल्मों में नरगिस नाम से मशहूर हुई उत्तमचंद के अलावा दलीपा ने तीसरी शादी भी की थी उससे भी उसको एक लड़की हुई थी 3 शादियों में उसकी 4 संतानें पैदा हुई थी। उस वक्त लोग फिल्मों में काम करना इतना अच्छा नहीं समझते थे। जद्दन उस वक्त पहली फिल्म कंपोजर बनी थी। उस वक्त जब फिल्में बनना शुरू हुई तो लाहौर में एक व्यक्ति हुआ करते थे जिनका नाम था हकीम बरम प्रसाद उसके कानों में भी जद्दनबाई के टैलेंट की गूंज पहुंची उस वक्त एक फिल्म बनाई गई हरीशचंद्र बाली और आगे जाकर यही हरीश चंदर बाली बड़ा संगीतकार बनता है और इसके साथ जद्दनबाई पहली बार फिल्मों में नजर आती है।

इसके बाद उसका फिल्मी करियर शुरू होता है और उसने नाम और शोरात कमाना शुरू कर दिया हमारी फिल्म इंडस्ट्री में मुश्किल में सात से आठ फिल्मी महिला कंपोजर हुई है सबसे पहली महिला फिल्मी कंपोजर जद्दनबाई थी। उसका जीवन बहुत संघर्ष पर आ रहा है। लेकिन आखिर में उसने वह पाया जिसकी उसे तलाश थी। उसने बहुत सारा पैसा और नाम कमाया इस तरह से  संजय दत्त की नानी की कहानी कितने लोगों ने  उसको सुना होगा और कितनों ने नहीं सुना होगा अपनी राय जरूर पेश करें

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